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गांव की पुकार

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिंदगी की दौड़ में कहां हम खो गए?
        
                                                    
                            
छोड़ कर घर द्वार ,नौकरी में खो गए
दो पैसे के लिए रिश्ते हमारे खो गए
रोजी रोटी के लिए
पापी पेट के लिए
गांव घर सब हमारे खो गए
हम किसी संस्था के हो गए
हम अपने बास के हो गए
वह गांव
वह छांव
वह खेत खलिहान
वह गंगा का मैदान
वह मेरा जन्म स्थान
कह रहा है,"ओ मेरे जान!
ओ मेरे प्राण! करो गांव को प्रस्थान
देखो अपना घर,जवार,और बाग बागान
तेरी माटी तुझे बुला रही है,ओ मेरे जवान!"
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
2 महीने पहले
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