विज्ञापन

फूल हूं सबको ख़ुश रखता हूं

Anonymous User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं फूल हूं वहीं जो सबको खुश रखता हूं
        
                                                    
                            
पर डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
होकर गांव की गलियों से शहरों की सैर करता हूं
जाता सब की शादी में भी , माटी पर ही मिटता हूं,
पर डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
गुथकर माला सीप में गले का हार बनता हूं
रूठे कोई दिल़ अगर जोड़ने का हौसला रखता हूं ,
डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
चढ़ता हूं रोज मंदिर में पैरों तले भी कुचलता हूं
नालियों से निकल कर कीचड़ में भी खिल उठता हूं,
सजा कर सबके घर को थोड़ा खुश हो जाता हूं
देकर सबको हजारों खुशियां रोज बिखर में जाता हूं
डाल से जुदा होकर कहां खुश रह पाता हूं
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Milan Thakur

5 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7450 कविताएं

View Profile