मैं फूल हूं वहीं जो सबको खुश रखता हूं
पर डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
होकर गांव की गलियों से शहरों की सैर करता हूं
जाता सब की शादी में भी , माटी पर ही मिटता हूं,
पर डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
गुथकर माला सीप में गले का हार बनता हूं
रूठे कोई दिल़ अगर जोड़ने का हौसला रखता हूं ,
डाल से जुदा होकर मैं भी कुछ कहता हूं,
चढ़ता हूं रोज मंदिर में पैरों तले भी कुचलता हूं
नालियों से निकल कर कीचड़ में भी खिल उठता हूं,
सजा कर सबके घर को थोड़ा खुश हो जाता हूं
देकर सबको हजारों खुशियां रोज बिखर में जाता हूं
डाल से जुदा होकर कहां खुश रह पाता हूं
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