फूल कुछ समय के लिए ही खिलते हैं,
फिर धीरे-धीरे मुरझा जाते हैं।
उन्हें मुरझाता हुआ देखकर
हम अक्सर उनसे दूर हो जाते हैं।
शायद हम यह भूल जाते हैं कि
खुशबू मुरझाए हुए फूलों से भी आती है।
छूकर देखो, अब कांटे भी नहीं चुभते;
छूने भर से हथेलियों में सिमट आते हैं।
मसल भी दो, तो उनकी
खुशबू देर तक ठहरी रहती है।
और उन्हें यदि छोड़ दो,
तो वे यूं ही पड़े रहते हैं-“अपनी सुगंध के साथ,
अपनी अंतिम साँस के बाद भी, सुगंध बाँटते हुए।”
मुरझाए हुए फूलों से यही सीख लेनी चाहिए-
“जीवन के अंतिम पड़ाव तक अपनी सुगंध,
अपना स्नेह और अपनी पहचान बाँटते रहना है।”
—अनीता 'निधि'