जब भी आँखों में छलकते आँसू लेकर
ससुराल से एक बेटी अपने घर आती हैं,
ना जाने क्यों माँ बाप को उन आँसुओ में
अपनी झूठी इज्जत बहती नजर आती हैं।
समझा बुझा कर उसे उसी नरक में वापिस भेज देते हैं,
जहाँ आँखों के आँसू कभी सुख ही नहीं पाते हैं।
जब तक वो जिंदा रहती हैं
किसी को उसकी तकलीफ दिखाई नहीं देती,
मरते ही उसके सबकी आँखे छलक आती हैं।
करते हैं केस अपना दिया पैसा गिनवाते हैं,
ससुराल वालों को चाहिए था दहेज सबको ये बताते हैं।
जो कल तक अपनी बेटी को चुपचाप सब
सहने की शिक्षा देते थे,
वो चाहिए न्याय अपनी बेटी के लिए
छाती पीट पीट कर ये शोर मचाते हैं।
समझ नहीं आता क्या ऐसा करने से
वो बेटी के साथ - साथ अपनी इज्जत भी नहीं गवाते?
या फिर शान्त रहे तो पैसा नहीं मिलेगा
इसलिए अपनी इज्जत का तमाशा वो खुद ही बनाते।
सच कहूँ तो एक बेटी एक बहू के जाने का गम
किसी को नहीं होता,
सब अपने अपने मतलब के लिए जिंदा और फिर मरने पर
अपने मतलब की रोटी सेंक कर खाते।
- अनिता शर्मा