सुरमई अँखियों से
सुरमई अँखियों से तुमने,
जब मुझको एक बार निहारा,
सूखे मन की बंजर धरती
बन बैठी हरियाली धारा।
जाने कैसी मधुर छुअन थी,
बिन बोले जो बात कह गई,
ज्यों संध्या की पहली किरणें
थकी धरा पर चुपचाप बह गईं।
उन नयनों में नील गगन था,
थोड़ा सावन, थोड़ी धूप,
थोड़ी-सी अनकही व्याकुलता,
थोड़ा जीवन का मधुर रूप।
मैंने उनमें झाँक के देखा—
अपना ही प्रतिबिंब खड़ा था,
जैसे वर्षों से बिछुड़ा कोई
आज अचानक पास पड़ा था।
न शब्दों की नाव चली थी,
न अधरों ने कुछ भी बोला,
किन्तु नयनों के उस सागर ने
मन का हर एक द्वार खोला।
सुरमई अँखियों की भाषा
कागज़ पर कब लिखी गई है?
यह तो सीधे हृदय पहुँचकर
प्रेम-वेदना कह गई है।
यदि जीवन में सत्य कहीं है,
यदि स्नेह अभी भी जीवित है,
तो वह उन गहरे नयनों में
निर्मल दीपक-सा दीप्त है।
सुरमई अँखियों की छाया
अब भी मेरे संग चलती है,
जैसे संध्या की शीतल बेला
मन के आँगन पलती है।
उन नयनों का एक निमंत्रण
जीवन भर का गीत बना,
सुरमई अँखियों से झरता
मेरा सबसे मधुर सपना।
- अनिता चतुर्वेदी