घिर-घिर आए मेघ गगन में,
हँसता आज गगन का मन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥
दादुर बोले, मोर नाचे,
डाली-डाली गान सुनाए।
पुरवाई चुपके से आकर
भीगे केश सहलाए।
रिमझिम बूँदें प्रेम-पत्र-सी
लिखतीं वन का अभिनंदन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥
धानों की मुस्कान लजाती,
खेत हुए कंगनधारी।
सोंधी गंध बिखेर रही है
भीगी-भीगी माटी प्यारी।
कजरी गाती पनघट-पनघट,
गूँजे मधुरिम लोक-नर्तन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥झूले पड़े नीम की डाली,
हँसती सखियाँ झूल रही हैं।
मेहँदी रचकर कोमल हथेली
प्रिय के सपने बुन रही हैं।
पायल की झंकार मिलाती
बूँदों से अपना स्पंदन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥
नदिया गाती कल-कल स्वर में,
पर्वत भी मुस्काता देखा।
बिजली ने क्षण-भर अंबर पर
स्वर्णिम सपना लिखता देखा।
प्रकृति आज वीणा बन बैठी,
गूँजा जीवन का वंदन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥
बरसो ऐसे, प्रेम न सूखे,
मन में रहे सदा उजियारा।
हर आँगन में स्नेह खिले,
हर घर हो खुशियों का द्वारा।
मानव-मन में फूल खिलें तो
धन्य बने यह शुभ जीवन।
धरती ने हरियाली ओढ़ी,
आया फिर मधुमय सावन॥
-अनिता चतुर्वेदी