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परीक्षा

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            परीक्षा
        
                                                    
                            

प्राची के
अरुण कपोलों पर
उषा ने लिखा—
"चलो!"
और
तुम खड़े रहे
प्रश्नों की धूल में
अपने ही भय का
बोझ उठाए।
किसने कहा—
परीक्षा
केवल काग़ज़ पर होती है?
देखो—
वह किसान,
तप्त धरती की छाती पर
हल की नोक से
लिख रहा है
अपना उत्तर।
वह माँ—
रात की बुझती लौ में
आँचल से ढँककर
सपनों को बचा रही है;
उसकी हर साँस
एक परीक्षा है।
पर्वत ने
तूफ़ानों से कहा—
"मारो प्रहार!"
और अडिग रहा।
नदी ने
शिलाओं से टकराकर
सीखा—
रुकना नहीं।
मनुष्य!
तुम क्यों काँपते हो?
असफलता
अंतिम सत्य नहीं,
वह तो
संघर्ष के द्वार पर बैठी
एक क्षणिक छाया है।
उठो!
अपने भीतर के सूर्य को
पहचानो।
परीक्षा
अंकों का उत्सव नहीं,
आत्मा की अग्नि में
तपकर
स्वर्ण होने का
मौन अनुष्ठान है।
चलो—
कि पथ तुम्हारी प्रतीक्षा में है;
विजय
उन चरणों को ही
वरण करती है,
जो गिरकर भी
फिर उठ खड़े होते हैं।
3 महीने पहले
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