मेरी रूह
धुँध की तहों में
कौन खड़ा है यूँ
जैसे किसी ने
अपने ही अस्तित्व को
प्रकाश के हवाले कर दिया हो।
चेहरा नहीं दिखता,
फिर भी लगता है
यह कोई अजनबी नहीं—
यह मेरी ही रूह है,
जो उम्र भर
मुझसे मिलने की प्रतीक्षा करती रही।
भीड़ ने
जिसे नामों से पुकारा,
रिश्तों ने
जिसे अपने-अपने अर्थ दिए,
वह सब देह थी...
रूह तो
हर संबोधन से मुक्त होकर
बस एक मौन की तरह
भीतर उतरती रही।
वह बोलती नहीं,
पर जब भी
आँखों में बिना कारण नमी उतरती है,
या किसी सांझ
अनायास कोई पुराना स्पर्श याद आता है,
तब वही
मेरे कंधे पर हाथ रखकर कहती है—
"चलो,
अभी तुम पूरी तरह नहीं खोए हो।"
रूह
न उजाले में रहती है,
न अँधेरे में—
वह उस क्षण जन्म लेती है
जब मन
अपने सारे मुखौटे उतारकर
स्वयं से आँख मिलाता है।
शायद इसलिए
इस धुँधली-सी आकृति के चारों ओर
इतनी रोशनी है...
क्योंकि
रूह कभी दिखाई नहीं देती,
वह केवल अपनी आभा छोड़ जाती है।
-अनिता चतुर्वेदी