मौन की देहरी
धूसर साँझ का आँचल ओढ़े,
बैठी है वह नीरव नारी।
एक हथेली थामे जाली,
दूजी थामे मन की डोरी।
दृष्टि कहीं है दूर क्षितिज पर,
जहाँ कोई स्मृति पुकार रही;
मानो नीरवता की उँगली
मन के घाव सहला रही।
माथे की नन्ही-सी बिंदी
तम में दीपक-सी जलती है।
होंठों पर ठहरी चुप्पी लेकिन,
आँखें पूरी कथा कहती हैं।
केशों में उलझी हैं शायद
बीते मौसम की परछाइयाँ;
किन्तु हृदय में अब भी जागीं
असंख्य सुनहरी संभावनाएँ।
कौन कहे यह थककर बैठी?
कौन कहे यह हार गई?
जो अपने विश्वास पर अडिग हो,
वह कब जग से हार गई?
जाली चाहे राह रोके,
मन की उड़ान कहाँ रुकती।
आशा जब संबल बन जाती,
हर सीमा स्वयं झुकती।
वह उठेगी धीरे-धीरे,
जैसे उषा उतरती नभ से।
अपने साहस की रेखाओं से
जीवन का विस्तार रचेगी।
न शोर होगा, न उद्घोष,
न कोई जयगान होगा;
उसके हर शांत कदम पर
एक नया विश्वास होगा।
यही तो स्त्री का सत्य है—
वह टूटकर भी बिखरती नहीं,
कुछ पल अपने भीतर ठहरती है,
फिर मुस्काकर
जीवन का एक नया अध्याय रचती है।
- अनिता चतुर्वेदी