मैं सुंदरी धरा सी तेरी
मैं सुंदरी धरा सी तेरी,
हरियाली का मधुर विधान।
अंकुर-अंकुर जीवन बोती,
देती जग को नव वरदान।
लुटाती रही हूँ तुझ पर
अपना सारा स्नेह अपार,
वन की छाया, नदियों का जल,
फूलों का निर्मल श्रृंगार।
तुम नभ सा प्रेम लुटाते जाना,
बनकर सावन की झंकार।
अपनी शीतल बाँह पसारो,
भर दो जीवन में विस्तार।
जब तेरी करुणा बरसती,
प्यासी मिट्टी गाती गान।
हर कण में नव चेतन जागे,
महके सारा यह संसार।
मैं तुझमें हो जाऊँगी विलीन,
यही प्रकृति का सत्य महान।
धरा और नभ का यह बंधन,
है सृष्टि का पावन सम्मान।
प्रेम जहाँ निस्वार्थ बहेगा,
वहीं खिलेगा हर अरमान।
धरा और नभ की यह गाथा,
रहे अमर जब तक है प्राण।
-अनिता चतुर्वेदी