लिखा कई बार ....
लिखा कई बार—
निशा के नीरव आँचल में
तुम्हारा नाम,
उषा की प्रथम किरण आई,
टूट गया वह स्वप्निल धाम।
लिखा कई बार—
“आओ, पथ के थके पथिक!
यह हृदय-द्वार अभी खुला है,
स्मृति की मूक वीणा में
अब भी तुम्हारा स्वर बसा है।”
कितनी संध्या ढल गईं,
कितनी रजनी बीत गई,
चंद्र-किरण की शीतलता में
मन की पीड़ा रीति गई।
विहग लौटकर नीड़ में आए,
वन में फिर मधुमास खिला,
पर मेरे सूने अंतर में
एक प्रतीक्षा का दीप जला।
लिखा कई बार—
“तुम बिन जीवन शून्य हुआ,”
फिर अंतर ने धीरे कहा—
“शून्य नहीं, यह मौन नया है,
जिसमें कोई सत्य छिपा है।”
चाँद उतर आया आँगन में,
तारे मौन खड़े थे,
मैं दीपक की लौ के सम्मुख
अपने प्रश्न लिए बैठी थी।
पूछा मैंने रात्रि से—
“क्या प्रेम विरह में मर जाता?”
रजनी ने मुस्काकर कहा—
“सच्चा प्रेम कहाँ मिट पाता!”
“वह तो बनकर स्मृति की सरिता
अंतर में बहता रहता है,
दूर बहुत हो जाए प्रियतम,
मन के पास ही रहता है।”
तब मैंने फिर कलम उठाई,
पर नाम तुम्हारा लिख न सकी,
भीगे हुए हृदय की भाषा
स्वयं से भी अब छिप न सकी।
लिखा—
“जो चला गया, वह स्मृति है,
जो रह गया, वह प्राण;
जिसे खोजती रही बाहर,
वह था मेरे ही अंतःस्थान।”
लिखा कई बार मिलन की आशा,
लिखा विरह का मौन,
लिखते-लिखते जान लिया—
मन ही अपना कौन।
अब न कोई शिकायत शेष,
न कोई मनुहार,
न लौट आने की आकांक्षा,
न पथ पर इंतज़ार।
अपने भीतर एक प्रभात की
नई किरण उगाई है,
टूटे स्वप्नों की राखों से
मैंने राह बनाई है।
लिखा कई बार तुम्हें मैंने,
अब स्वयं को लिखती हूँ,
बीते कल की छाया से निकल
नव जीवन फिर रचती हूँ।
प्रेम अगर दीपक है तो
विरह उसकी उजली लौ,
जो जलकर भी राह दिखाए,
उससे सुंदर क्या हो?
अब मेरी अधूरी पंक्ति
मुझसे ही कहती है—
जिसे लिखते-लिखते खोजा था,
वह शब्द नहीं—मैं ही थी।
- अनिता चतुर्वेदी