कुटज ~
शैल-शिखर की मौन गोद में,
किसने यह मधु-स्वप्न सँवारा?
तप्त धरा के मौन हृदय में,
श्वेत स्वप्न-सा खिला कुटज।
नभ की नीलिम छाँह न माँगी,
न माँगा मेघों का अनुराग,
कठिन शिलाओं के अंतर से
फूटा जीवन का मधुर राग।
पवन चला तो डोल उठे तुम,
झंझा आई—हँसते रहे,
तप्त दिवस की ज्वाला पीकर
श्वेत सुधा-से खिलते रहे।
निस्तब्ध वन की एकांत बेला,
जब जग सोता स्वप्न सँजोए,
तब तुम अपनी मंद सुगंध से
किसके अंतर-द्वार भिगोए?
तुमने सिखलाया हे कुटज,
जीवन केवल फूल नहीं;
पीड़ा की गहरी मिट्टी में भी
सौंदर्य कहीं दूर नहीं।
जड़ में धरती, शिर पर आकाश,
बीच तुम्हारे मौन प्रकाश,
छोटे-से अस्तित्व में जैसे
समाया हो जीवन-विश्वास।
ऋतु बदले, दिन ढले, अँधियारा
आकर चाहे राह रोक ले,
जिसके अंतर ज्योति जगी हो,
वह पत्थर में फूल उगा दे।
हे कुटज! तुम्हारी श्वेत हँसी में
मैंने जीवन-मंत्र पढ़ा—
जो विपदा में भी मुस्काए,
उसने ही सच जीवन गढ़ा।
-अनिता चतुर्वेदी