मंद पवन के संग बज उठी
कटि की मधुर किंकिणी,
जैसे नीरव वन में गूँजी
कोई भूली रागिनी।
चाँद उतर आया आँगन में,
रजनी हुई सुवासित-सी,
ओस-कणों पर चुपके से
चाँदनी हँसी झिलमिल-सी।
किसकी चाल से झरता है
यह संगीत अनोखा-सा?
किसकी आहट भर देती है
मन को मधुर उजाला-सा?
किसलय काँपे, फूल महक उठे,
ठिठकी वन की हरियाली,
ज्यों सुनने को आतुर होकर
रुक गई रात निराली।
किंकिणी की हर झंकार में
कितने भाव छिपे होंगे,
कुछ अनकहे प्रणय के होंगे,
कुछ सपने अधखिले होंगे।
कभी विरह की धीमी सिसकी,
कभी मिलन की मधुर पुकार,
कभी किसी के लौट आने का
जाग उठे मन में इंतज़ार।
चलती जब वह मंद-मंद तो
झंकारे उसकी किंकिणी,
धरती पर जैसे लिख जाती
जीवन की कोई रागिनी।
क्षण भर को जब थम जाती है
उसकी मधुर झंकार,
तब भी मन में बजता रहता
वह स्वर बारंबार।
शायद इसीलिए स्मृतियों में
ध्वनियाँ मरती नहीं—
पग दूर चले जाते हैं,
पर मन की किंकिणी
कभी मौन होती नहीं।