मेरी कान की बाली कहीं खो गई है,
तुम्हें मिली क्या...?
वह सोने की बाली भर नहीं थी,
उसमें हँसी के कुछ मोती जड़े थे,
माँ की सीख, बिटिया की मुस्कान,
और कुछ अपने सपने पड़े थे।
शायद रसोई की खनखनाहट में,
या आँगन की मिट्टी में सो गई है,
मेरी कान की बाली कहीं खो गई है,
तुम्हें मिली क्या...?
कहीं पूजा की थाली में छिपी होगी,
या आँचल की सिलवट में अटकी होगी,
कभी अलमारी, कभी तकिया टटोला,
हर जगह मेरी नज़र भटकी होगी।
अब तो उसकी कीमत सोने से नहीं,
उससे जुड़ी यादों से हो गई है।
मेरी कान की बाली कहीं खो गई है,
तुम्हें मिली क्या...?
यदि मिले तो संभालकर रखना,
वह मेरे जीवन की छोटी-सी कहानी है।
उसमें माँ का आशीष, बेटी का स्नेह,
और बीते वर्षों की निशानी है।
बाली तो फिर बन जाएगी,
पर वह अपनापन कहाँ मिलेगा?
जो खोया है, वह गहना नहीं,
दिल का एक कोना है...
मेरी कान की बाली कहीं खो गई है,
तुम्हें मिली क्या...?