संध्या थी गंभीर, गगन था
मौन, अचल, निस्तब्ध, विशाल।
एक नारी चिंतन में डूबी,
लिए हृदय में गहन उछाल।
कर पर निज मस्तक टिकाए,
बैठी थी निश्चल, निर्विकार;
मानो जीवन-संघर्षों पर
करती हो गंभीर विचार।
नयनों में इतिहास अनेक
आज अभी भी जीवित थे;
बीते युग की मधुर स्मृतियाँ
आज भी मन में संचित थीं।
फीकी पड़ती मेहँदी में भी
शेष प्रणय का रंग रहा;
समय लूट ले गया बहुत कुछ,
पर न हृदय का ढंग रहा।
गंभीर वसन न केवल ढाँपे
मन की कोई पीर प्रखर;
उनके भीतर धैर्य-दीप था,
जिसका प्रकाश रहा अमर।
पीड़ाओं को हार न माना,
बना लिया निज भूषण उन्हें;
अश्रु नहीं दुर्बलता उसके,
बल के पावन कण थे वे।
नहीं प्रतीक्षा किसी पथिक की,
न लौटे पदचापों की;
अपने ही अंतर में खोजे
राह नए विश्वासों की।
जीवन केवल सुख का उत्सव
कब होता है इस भू पर?
विपदा ही तो मनुष्य बनाती
अडिग उसे हर कठिन डगर।
इस कारण मत मौन समझकर
उसको निर्बल जानो तुम;
अंतर में वह जला रही है
आशा का अविनाशी सुमन।
आएगा वह शुभ प्रभात भी,
जब वह फिर मुस्काएगी;
घोर निशा के बीत चुकने पर
अरुण-किरण बन छाएगी।
संदेश यही जीवन का है—
धैर्य कभी मत खोना तुम;
जो संकट में अडिग खड़ा हो,
विजय उसी का वरण करे।
- अनिता चतुर्वेदी