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जल-दर्पन देखत राधा

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ब्रजभाषा-शैली ~जल-दर्पन देखत राधा
        
                                                    
                            

झुकि जल-तीर बिराजत राधा, नैनन प्रेम समाय।
नीर निहारत श्याम-सुन्दर, सुधि तन की बिसराय॥

नीर मध्य मुरलीधर मोहन, मधुर मुरलि रस घोले।
सुनि वह तान कमल मुसुकाने, पवन सुगंधहि डोले॥

मोर मुकुट सिर, बनमाला सोहै, कुंडल झलकत कान।
नीर-लहरि में छबि अति छबिली, हरष्यो सकल जहान॥

राधा चितवत पलक न झपकत, मन हरि चरण समर्पे।
ज्यों चकोर चंदा पर लोभे, त्यों दृग श्यामहि धरपे॥

जल-दर्पन में रूप दुहुँ के, एकहि रंग समाने।
प्रेम जहाँ दूजो नहिं रहतौ, तहाँ भेद कछु न जाने॥

मुरली की मधुरिम धुनि सुनि-सुनि, अलि गुंजन बिसरायो।
तरु-पल्लव सब ध्यान लगायो, यमुना नीर लजायो॥

कमल-कली अरु हंस-विहग सब, भए प्रेम-अधिराने।
जड़-चेतन सब भाव-विभोरे, हरि-रस भीतर छाने॥

राधा कहै—"मोहन! मोरे, तुम बिन और न कोई।"
श्याम हँसि बोले—"प्रेमहि पंथ, संग चलै जो सोई।"

सूर-सुभाव कहै यह दासी, प्रेम परम धन जानो।
राधा-श्याम बसैं जेहि उर में, सोई वृंदावन मानो॥
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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