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जब तुम्हारा ज़िक्र आया~

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब तुम्हारा ज़िक्र आया~
        
                                                    
                            

जब तुम्हारा ज़िक्र आया,
फूल अपनी डालियों से मुस्कुराने लग पड़े,
बंद कलियों के अधरों पर
मधुर गीत खिल उठे।

खुशबुएँ पवन के संग
दूर तक संदेश लेकर चल पड़ीं,
जैसे हर मौसम ने
तुम्हारे नाम की माला पहन ली हो।

चाँद ने भी
अपनी चाँदनी का आँचल बिछा दिया,
रात के सूने माथे पर
सपनों का तिलक सजा दिया।

जुगनुओं ने अँधेरे से कहा—
"अब लौट जाओ,
किसी की याद का उजाला
हमसे अधिक चमकता है।"

सितारे भी
नभ से उतर आए चुपके-चुपके,
और मेरी तन्हा रात को
उत्सव बना गए।

मैंने तो केवल
एक ग़ज़ल लिखनी चाही थी,
पर शब्दों ने
हर मिसरे में तुम्हारी मुस्कान बसा दी।

अब मेरी हर कविता में
तुम्हारा ही आकाश है,
हर उपमा में तुम्हारा स्पर्श,
हर रूपक में तुम्हारी छवि।

सच तो यह है—

फूल, खुशबू, चाँद, जुगनू और सितारे
यूँ ही नहीं चले आए;
जब प्रेम सच्चा होता है,
तो प्रकृति स्वयं
कवि की स्याही बन जाती है,
और ख़ुद-ब-ख़ुद
हर कविता में
प्रिय का फ़साना उतर आता है।
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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