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हम कुटज हैं

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हम कुटज हैं
        
                                                    
                            

हम कुटज हैं—
पथरीली धरती के वासी,
धूप मिले या धूल मिले,
फिर भी रहते हँसते-हँसते,
जीवन के विश्वास के वासी।

न माँगी हमने छाँह किसी से,
न मेघों का दान लिया,
जिस मिट्टी ने स्थान दिया बस,
उससे ही सम्मान लिया।

सूखी धरती, तीखी धूपें,
कितनी ऋतुएँ आईं-गईं,
हमने अपनी जड़ों के बल पर
जीवन की राहें नई गढ़ीं।

आँधी आई—डटे रहे हम,
झंझा आई—हँसते रहे,
टूटे कितने डाल-पात,
फिर भी हम तो बढ़ते रहे।

न वैभव का मोह हमें है,
न अभाव से कोई भय,
अपने श्रम पर विश्वास हमारा,
अपना पथ—अपना ही निश्चय।

किसी सहारे की याचना नहीं,
न भाग्य को देते दोष,
अपने भीतर अग्नि जलाकर
जीवन में भरते संतोष।

जो विपदा से आँख मिलाकर
अपने पथ पर बढ़ते हैं,
वे ही इस संसार-वन में
सच्चे अर्थों में कुटज हैं।

हम कुटज हैं—
सीख यही संसार को देते,
जीवन केवल सुख में नहीं,
संघर्षों में भी खिलते।

माटी चाहे कठोर मिले,
मौसम चाहे रूखा हो,
जिसके भीतर जीने का बल—
उसका हर दिन सुंदर हो।

हम कुटज हैं—
हार नहीं स्वीकारेंगे,
पत्थर पर भी जड़ें जमाकर
अपने हिस्से का आकाश सँवारेंगे।
-अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
एक घंटा पहले
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