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हिमालय : राष्ट्र का अडिग प्रहरी

Anita Chaturvedi

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                            हिमालय : राष्ट्र का अडिग प्रहरी
        
                                                    
                            

मत देखो इस पर्वत को
केवल बर्फ़ीले शिखरों की माला,
यह भारत की जागृत चेतन,
युग-युग का अमर विजय-ज्वाला।

जिसने तूफ़ानों को रोका,
जिसने कालचक्र को जाना,
जिसकी चोटी पर इतिहासों ने
स्वर्णिम अपना नाम लिखा।

जब-जब धधकी रण की ज्वाला,
जब-जब सीमा काँप उठी थी,
सबसे पहले हिमशिखरों ने
अपनी छाती तान रखी थी।

इसकी हर चट्टान कह रही—
"झुकना मेरा धर्म नहीं है,
जो भारत की ओर बढ़ेगा,
उसका फिर उद्धार नहीं है।"

गूँज उठो, हे वीर जवानों!
रग-रग में ज्वालाएँ भर लो।
हिमगिरि का यह श्वेत मुकुट
अब अपने साहस से उज्ज्वल कर लो।

शीत यहाँ दुर्बलता नहीं है,
यह तप की दीप्त अग्नि बनी है।
बर्फ़ नहीं, यह राष्ट्र-प्राण की
संकल्पों की शिला घनी है।

गंगा जिसकी गोद से निकली,
जन-जन की प्यास बुझाती है;
यमुना जिसकी छाया पाकर
प्रेम-धरा को हरषाती है।

यह केवल भूखंड नहीं है,
यह ऋषियों का मौन तपोवन;
यह रणबाँकों की हुंकारों का
अविरल गूँजता अभिनंदन।

यदि कोई अभिमान लिए फिर
भारत की सीमा लाँघेगा,
हिमालय का प्रत्येक शिखर
तब वज्र-प्रहार बन जागेगा।

आओ, इसकी शपथ उठाएँ—
कायरता को स्थान न देंगे,
जब तक प्राण धड़कते होंगे,
भारत का सम्मान न देंगे।
किसी शत्रु के हाथ कभी भी,
स्वाधीन ध्वजा झुकने न देंगे।

अचल रहो, हे हिमगिरि!
हम भी तेरे ही संतति हैं।
तेरी ऊँचाई से सीखें—
विजय वही, जो राष्ट्र-भक्ति है।
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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