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हरी चूड़ियों का गीत

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हरी चूड़ियों का गीत
        
                                                    
                            

श्वेत धरा पर हरित स्वप्न-सी
आज सजी यह रूप-लता,
मानो ऋतु ने स्वयं सँवारा
स्नेहिल मन की मधुर व्यथा।

कलाई भर हरित चूड़ियाँ,
धीरे-धीरे खनक रही हैं,
जैसे वन की मौन डालियाँ
पवन संग कुछ कह रही हैं।

झुकी हुई पलकों के नीचे
मुस्कानों का एक नगर है,
जहाँ न कोई शब्द पहुँचता,
केवल मन का निर्मल स्वर है।

केशों में गुँथा श्वेत गजरा
साँझ-सुगंध बिखेर रहा,
जैसे चुपचाप चाँद किसी का
स्वप्न अधूरा फेर रहा।

दर्पण से भी पहले उसने
अपने मन को देख लिया,
इसीलिए तो एक कंगन
छूकर सब कुछ कह दिया।

श्रृंगार तभी पूर्ण हुआ है,
जब विनय साथ मुस्काती है;
रूप तभी सचमुच खिलता है,
जब आत्मा झिलमिलाती है।

हर चूड़ी में एक प्रार्थना,
हर बिंदी में एक प्रकाश,
नारी केवल रूप नहीं है—
जीवन का विश्वास।

श्वेत साड़ी की हरित लकीरें
जैसे आशा का विस्तार,
जो भी देखे, उसके मन में
खिल उठे एक नया बहार।
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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