दिन भर की आपाधापी के बाद
जब थम गई शहर की रफ़्तार,
खिड़की से झाँकती शाम ने
चुपके से छुआ मन का द्वार।
न जाने क्यों उस पल
मन हुआ आत्मविभोर,
जैसे किसी अनसुने गीत ने
छेड़ दिए हों भावों के छोर।
हवा में घुली थी
माटी की सौंधी-सी महक,
दूर कहीं पायल छनकी तो
जाग उठा स्मृतियों का कौतुहल।
जीवन की उलझी राहों में
कितना कुछ पीछे छूट गया,
फिर भी मन ने हार न मानी,
टूटा सपना फिर से जुड़ गया।
वह कैसी अनोखी शाम थी—
न चाँद पूरा, न रात पूरी,
फिर भी आँखों में उतर आई
एक स्वप्निल-सी तस्वीर अधूरी।
कुछ प्रश्न हवा में ठहरे थे,
कुछ उत्तर मौन में पलते थे,
मन की गहरी तह में जाने
कितने मौसम चलते थे।
तभी लगा—
खुशियाँ कोई दूर सितारा नहीं,
वे तो मन के भीतर रहती हैं;
बस उन्हें पाने की आस
आँखों में जीवित रखनी होती है।
और सच कहूँ—
उस शाम के बाद मेरा जीवन
कुछ और खुशनुमा हो गया,
क्योंकि उम्मीद का छोटा-सा दीप
हर अँधेरे से बड़ा हो गया।
शायद यही तो मन का इंद्रधनुष है—
दुःख के बाद भी रंग चुन लेना,
टूटे हुए पलों की हथेली पर
एक नया सपना बुन लेना।
और फिर किसी अनोखी शाम में
जब मन स्वयं से मिलने आए,
तो आँखों में सात रंग लेकर
जीवन फिर से मुस्कुराए।
-अनिता चतुर्वेदी