भरा-भरा सा आज गगन है,
प्यासी धरती मुस्काई,
नदियों के सूने किनारे पर
फिर से लहरें आईं।
ऋतु वर्षा की लेकर अपने
मीठी-सी सौगात,
आई देखो भादों लेकर
रिमझिम वाली बरसात।
बूँदों ने जब धरा चूम ली,
महकी माटी सारी,
हरियाली के आँचल में फिर
सज गई दुनिया प्यारी।
नदियों का कल-कल संगीत उठा,
झूम उठा हर किनारा,
मोर नाचे वन-उपवन में,
चमका नभ का तारा।
सूखे पत्तों पर मोती बन
बूँदें लगीं झिलमिलाने,
भादों की इस मधुर ऋतु में
मन भी लगा मुस्कुराने।
प्यासी आँखों ने पा ली जैसे
सपनों की सौगात,
धरती के हर कण में गूँजी
वर्षा की मधुर बरसात।
- अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’