आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

नदियों का कल-कल संगीत उठा

                
                                                         
                            भरा-भरा सा आज गगन है,
                                                                 
                            
प्यासी धरती मुस्काई,
नदियों के सूने किनारे पर
फिर से लहरें आईं।

ऋतु वर्षा की लेकर अपने
मीठी-सी सौगात,
आई देखो भादों लेकर
रिमझिम वाली बरसात।

बूँदों ने जब धरा चूम ली,
महकी माटी सारी,
हरियाली के आँचल में फिर
सज गई दुनिया प्यारी।

नदियों का कल-कल संगीत उठा,
झूम उठा हर किनारा,
मोर नाचे वन-उपवन में,
चमका नभ का तारा।

सूखे पत्तों पर मोती बन
बूँदें लगीं झिलमिलाने,
भादों की इस मधुर ऋतु में
मन भी लगा मुस्कुराने।

प्यासी आँखों ने पा ली जैसे
सपनों की सौगात,
धरती के हर कण में गूँजी
वर्षा की मधुर बरसात।
- अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’
 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर