अधूरा पत्र
आज पुनः संध्या की पलकों पर
एक नीरव स्मृति उतर आई,
ज्यों बिखरे नभ के एकाकी तारे
धरती पर अपनी राह भुलाई।
किसकी सुधियों का पीत पृष्ठ यह,
उर से लगते ही भीग गया?
किस अनकहे संबोधन का स्वर
मौन व्यथा में लीन हो गया?
दीपक की थरथर लौ ने जैसे
मन का तम आलोकित कर डाला,
किन्तु उसी क्षण छाया ने आकर
हर उजियारा फिर हर डाला।
अक्षर-अक्षर बिखरे मोती,
पर अर्थ कहीं खोते जाते;
नयन-नीर की मंद सरिता में
सब स्वर बहते सोते जाते।
मैंने चाहा—
एक क्षण को समय ठहर जाए,
वह जो कभी नहीं लौटा,
फिर से द्वार मेरा भर जाए।
पर स्मृतियाँ पवन की चंचल लहरें,
किस बंधन में बँध पाती हैं?
वे तो केवल मन-वीणा के
मूक तार छेड़ जाती हैं।
अब न कोई प्रश्न शेष है,
न कोई उत्तर का आग्रह;
बस एक पत्र, एक दीपशिखा,
और हृदय का अनंत विरह।
- अनिता चतुर्वेदी