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आकाश का पत्र

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आकाश का पत्र~
        
                                                    
                            

आकाश ने
आज फिर
धरती के नाम
एक भीगा हुआ पत्र लिखा है।

स्याह बादलों की स्याही में
बिजलियों की कलम डुबोकर
किसी अनदेखे कवि ने
क्षितिज पर
उजाले के हस्ताक्षर कर दिए हैं।

नदी
अपनी पुरानी चुप्पियाँ छोड़कर
गुनगुनाती चली जा रही है,
जैसे वर्षों बाद
उसे अपना ही पता मिल गया हो।

खेत की मेड़ पर खड़ा किसान
बादलों को नहीं देखता,
वह देखता है
अपने बच्चों की मुस्कान,
जो हर बूँद के साथ
अन्न का रूप धरती पर उतरती है।

उधर
पीपल की बाँहों में बँधा झूला
सिर्फ़ झूल नहीं रहा,
उस पर बैठी हँसी
सावन की उम्र बढ़ा रही है।

सखियों के गीतों में
बरसात नहीं बरसती,
बरसती हैं वे स्मृतियाँ
जिन्हें हर वर्ष
मेघ अपने साथ वापस ले आते हैं।

मोर ने
जब अपने पंख खोले,
लगा मानो
धरती ने
अपने सारे रंग
एक ही प्रार्थना में समेट लिए हों।

मेंढकों का स्वर,
चिड़िया की पुकार,
पत्तों पर गिरती बूँदों की थाप—
यह कोई शोर नहीं,
प्रकृति का वह राग है
जिसे सुनकर
मौन भी गाने लगता है।

और मैं सोचता हूँ—
यदि मनुष्य
अपने भीतर की धूल
इन्हीं वर्षा-बूँदों में धो सके,
तो शायद
हर सावन के बाद
सिर्फ़ पेड़ ही नहीं,
मन भी
फिर से हरा हो जाए।

धरती पर उतरती वर्षा
दरअसल पानी नहीं,
ईश्वर का वह विश्वास है
जो हर बार कहता है—

"जब तक प्रकृति मुस्कुराती रहेगी,
तब तक जीवन
किसी कविता की तरह
अधूरा नहीं होगा।"

-अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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