खुद को खुद से जुदा कर देती है,
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।
आदमी को इंसान बना देती है,
तमन्नाओं की सूली पर चढ़ा देती है।
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।
परिवार को अपनों से दूर कर देती है,
अरमानों का गला घोंट देती है।
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।
कभी मेहनत करके भी सबकी शोहरत दिला देती है,
पर बदले में बहुत कुछ गंवा देती है।
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।
ऊँचाइयों पर पहुँचा देती है,
पर धीरे-धीरे सब कुछ पीछे छूटवा देती है।
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।
ऐसा क्यों होता है कि
जो चाहा, वह मिलकर भी अधूरा-सा लगता है।
ज़िंदगी भर जिनके लिए कमाते हैं,
वही हम पर इलज़ाम लगाते हैं।
ये नौकरी है साहब, कुछ सिखा देती है।