विज्ञापन

तू क्या दर्पण दिखाती है

anil shah

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शराब, तू क्या दर्पण दिखाती है,
        
                                                    
                            
मेरे होने और न होने का एहसास कराती है।

कभी हिचकी बनकर उसकी याद दिलाती है,
तो कभी दिल से रूह तक उतर जाती है।

कभी काँच से काँच टकराने की ध्वनि में उसकी याद जगा देती है,
फिर मुझे मेरे अपने होने का एहसास करा देती है।

शराब, तू क्या दर्पण दिखाती है,
मेरे होने और न होने का एहसास कराती है।

तुझे छूकर मैं बिखर भी जाता हूँ,
फिर अपने ही विचारों में सिमट भी जाता हूँ।
आँसू भी मेरे हैं, मुस्कान भी मेरी,
हर जाम में मेरी अधूरी कहानी नज़र आती है।

शराब, तू क्या दर्पण दिखाती है,
मेरे होने और न होने का एहसास कराती है।

मैं हारकर भी स्वयं को जीतना सीखता हूँ,
अपने भीतर रहकर भी स्वयं को खोजता हूँ।
ज़िंदगी के बोझ तले जब दब जाता हूँ,
तेरी ख़ामोशी में अपने मन की आवाज़ सुन पाता हूँ।

शराब, तू क्या दर्पण दिखाती है,
मेरे होने और न होने का एहसास कराती है।

तू मुझे मेरे भीतर झाँकने का रास्ता दिखाती है,
मेरे अस्तित्व का अनकहा सत्य बताती है।

कभी लगता है तेरी याद नहीं आई,
पर ज़िंदगी हर मोड़ पर आत्ममंथन का अवसर दे जाती है।

शराब, तू क्या दर्पण दिखाती है,
मेरे होने और न होने का एहसास कराती है।

तू नशा नहीं, मेरे मन का एक दर्पण है,
जो हर टूटे हुए एहसास की कहानी कहता है।
तेरे हर घूँट में एक अनकही दास्तान छिपी है,
और हर ख़ामोशी में मेरी पहचान दिखाई देती है।
-अनिल शाह
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all