मनुष्य हमेशा से मानता आया है, कि जब हम बच्चे थे, तब ना- समझ थे, लेकिन बच्चे और बड़े आदमी में कितना अंतर होता है,
अंतर विषय:- सोच समझ में आदमी बच्चों की तरह रहता तो, कितना अच्छा होता,
आदमी बच्चों की तरह खुशी मनाता तो कितना अच्छा होता, जैसे:- बच्चे असली रूपयों से दुकान से नकली नोटों को पाकर,
कितना खुश होता है,
जबकि आदमी असली नोटों से भी खुश नहीं होता।
- अनिल मीणा