*वेदना रग-रग जलाई जा रही*
वेदना रग-रग जलाई जा रही,
आग सीने में लगाई जा रही।
मुस्कुराने की सज़ा है इस क़दर,
ज़िंदगी आँसू पिलाई जा रही।
दर्द की चादर बिछी है राह में,
धूप जलती है मेरी हर आह में।
कौन सुनता है हृदय की चीख़ को,
चुप्पियों की धुन बजाई जा रही।
स्वप्न सारे राख होते जा रहे,
पाँव अपने आप खोते जा रहे।
मंज़िलों की आस लेकर चल पड़े,
राह काँटों से सजाई जा रही।
फिर भी मन में दीप जलता ही रहे,
आँधियों से जूझ पलता ही रहे।
हार को स्वीकार करना है नहीं,
आस जीवन की जगाई जा रही।
-पंडित अनिल