ओ प्राणवल्लभा मेरी प्राणेश्वरी
क्या कर रही हो ये तुम ?
कभी चूल्हा चौकी,
कभी घर गृहस्थी,
क्या ? यही है तेरी हस्ती ।
माना थोड़ी उलझ चुकी हो ।
अपनों से ही जूझ रही हो ।
अब तो हिम्मत कर ले थोड़ा ।
क्या होगा ? फिर गिर जाओगी ।
कोशिश तो कर वल्लभा,
संभल जाओगी ।
अपनी दुनिया ख़ुद बसा लोगी ।