कलम तुम्हारी व्यर्थ चली है
जीव तुम्हारी व्यर्थ हिली है,
वो ना पाए क्रांति बीज तुम
कभी नहीं तू रहा कवि है ।
तू डरता है किसी के आगे
कलम किसी की नौकर है,
तो समझो अब सरस्वती को
तभी लगे हुए शनि हैं ।
तू गागर में सागर भरना
या सागर को गागर में,
मगर कभी ना ठंडी होवे
तेरे मन में आग लगी है ।
तू अपने को समझ कर पागल
राग अलाप ले मनमाना,
सुनता नहीं है कोई सहोदर
सबको अपनी-अपनी पड़ी है ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर