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तू अपने को समझ कर पागल

                
                                                         
                            कलम तुम्हारी व्यर्थ चली है
                                                                 
                            
जीव तुम्हारी व्यर्थ हिली है,
वो ना पाए क्रांति बीज तुम
कभी नहीं तू रहा कवि है ।

तू डरता है किसी के आगे
कलम किसी की नौकर है,
तो समझो अब सरस्वती को
तभी लगे हुए शनि हैं ।

तू गागर में सागर भरना
या सागर को गागर में,
मगर कभी ना ठंडी होवे
तेरे मन में आग लगी है ।

तू अपने को समझ कर पागल
राग अलाप ले मनमाना,
सुनता नहीं है कोई सहोदर
सबको अपनी-अपनी पड़ी है ।
- आनन्द गुर्जर सहोदर
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
38 मिनट पहले

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