बचपन कब आता है,
और कब जाता है।
कभी सड़क किनारे धूल में लिपटा,
कूड़े में रोटी के टुकड़े खोजता है।
कभी स्कूल की घंटी के संग,
किताबों में सपने बोता है।
कभी हाथ फैला,
भीड़ से दुआएँ माँगता है।
कभी छत के पंखे तले,
अमीर बस्तियों में,
खिलौनों के ढेर में भी
अधूरा रह जाता है।
कहीं भूख कुछ ऐसा सिखा देती है,
कि मासूम हाथों में
पथराई सी बेचैनी भर जाती है।
कहीं पेट की आवाज़
इतनी ऊँची हो जाती है,
कि समाज की लाठी भी
उसे चुप नहीं करा पाती।
कभी कोई बच्चा
भूखा सोता है,
तो कभी पेट भर कर भी
मन का खालीपन रोता है।
कहीं ज़िन्दगी
सड़कों पर काँच सी चुभती है,
तो कहीं महंगे खिलौनों के बीच
अकेलेपन की धुंध घिरती है।
बचपन कब आता है,
और कब जाता है,
किसी को पता ही नहीं चलता।