हम इमां लाएँ ना लाएँ जान तो जानी ही है
आप को पाएँ ना पाएँ जान तो जानी ही है
जाने क्या-क्या वलवले थे अपने भी औरों के भी
सारे चाहे ज़ाया जाएँ जान तो जानी ही है
वक़्त अपनी चाल की रफ़्तार कम करता है कब
उम्र का ग़म क्या मनाएँ जान तो जानी ही है
आज कल की बात है ये हादसा होना तो है
कैसे होगा क्या बताएँ जान तो जानी ही है
मान लो कोई नहीं है कायनात का सरबराह
है सोच कर क्यों न जाएँ जान तो जानी ही है
हम भी नुक्ताचीं नज़र बारीक़बीनों में से हैं
जीते जी कुछ तो दिखाएँ जान तो जानी ही है
एक खटका हर घड़ी है क्या कमी कोशिश में है
बाद में ना मुँह की खाएँ जान तो जानी ही है
इश्क़ हम पर हँस रहा है है अक़ीदत देखती
अब भी क्या यूँ डगमगाएँ जान तो जानी ही है
पर्दा गर अपनी ख़ुदी है हिज़्र अहसासे वजूद
क्यों इन्हीं को ना मिटाएँ जान तो जानी ही है
आओ ‘अंजुम’ ख़ाक कर दें नूर को उस वास्ते
ख़ुद जलें और जगमगाएँ जान तो जानी ही है
-अमिता अंजुम अज़ीमाबादी