अटूट आस्था का ये बंधन, खुशियों की मिठास हैं!
घर के चिरागों ने थाली सजाई हैं,
उदास चेहरे पर भी मुस्कान की छाई है!
लेकिन हकीकत भी इस बंधन के दो पहलू हैं...
एक ओर जहां खुशियों का आगमन हैं,
दूसरी तरफ वीरान पड़े आंगन हैं!
चौखटों को निहारते इंतजार में हैं,
मन ही मन भावों को बहलाते हैं!
रक्षा बंधन एक पर्व नहीं विश्वास का नाम हैं,
धागे का मोल नहीं बहनों के प्रति सम्मान का भाव हैं!
विश्वास में ही रक्षा हैं,
अटूट प्रेम समर्पण रक्षा बंधन की पहचान हैं।
~अमित सिरसाम