घाव बहुत गहरे भीतर के
है हृदय चोटिल मेरा
बाणों की सैय्या पर लेटा
भीष्म सा जीवन मेरा
किस हिस्से का दर्द लिखूँ
है रोम-रोम घायल मेरा
औंधी है सूरज की किरणें
अंधियारों का है डेरा
धृतराष्ट्र की नीति पर
नयनों में आँसू भरते हैं
इच्छा मृत्यु पर भी देखो
भीष्म नहीं ये मरते हैं।
और लपकती लाक्षागृह से
डरता है ये मन मेरा
बाणों की सैय्या पर लेटा
भीष्म सा जीवन मेरा।
- अमित प्रेमशंकर