चाँद चाँद न कहते, तुझे दुल्हन कहते,
तेरे चेहरे को हम इश्क़ का सावन कहते।
तेरी आँखों में जो डूबे, वो निकलता ही कहाँ,
हम तो उस डूबने को अपना मुक़द्दर कहते।
तेरी ख़ुशबू से महक उठती है तन्हा रातें,
तेरे आने को भी हम मौसम-ए-गुलशन कहते।
तू जो हँस दे तो बहारों का पता मिलता है,
तेरी मुस्कान को हम रूह की धड़कन कहते।
तेरे बिन शाम भी वीरान सी लगती है हमें,
तेरी यादों को ही फिर रात का दामन कहते।
तू मिले या न मिले, इश्क़ रहेगा ज़िंदा,
हम मोहब्बत को कहाँ कोई समझौता कहते।
तेरे होने से मुकम्मल है मेरी दुनिया भी,
तुझको खोने को भला कैसे हम जीवन कहते।
‘अमित’, इश्क़ अगर नाम है तेरा ही तो फिर,
हम तुझे चाँद नहीं—अपनी पूरी दुनिया कहते।