हर इंसान
वही नहीं होता
जो उसकी पहचान बताती है।
कई लोग वो भी बन जाते हैं
जो हालात उन्हें बना देते हैं।
किसी कवि ने भी
शब्दों में अपना घर बसाने का सपना देखा होगा,
मगर उसके हिस्से आए
फ़ाइलों के ढेर,
रजिस्टर, नोटशीटें,
हस्ताक्षर और अंतहीन ज़िम्मेदारियाँ।
किसी चित्रकार ने भी चाहा होगा
कि उसकी उँगलियाँ रंगों से बातें करें,
मगर अब वे
कीबोर्ड, काग़ज़
और समय-सीमाओं के बीच
अपनी कल्पना तलाशती हैं।
किसी गायक की आवाज़
तालियों की हक़दार रही होगी,
लेकिन अब वही आवाज़
औपचारिक बातों में
अपना सुर खो चुकी है।
किसी लेखक ने भी सोचा होगा
कि वह किताबें लिखेगा,
मगर वह उम्र भर
दूसरों के दस्तावेज़ सँवारता रहा,
और उसकी अपनी कहानी
मसौदा ही बनी रही।
सच तो यह है...
बहुत कम लोग
अपनी पसंद का जीवन जीते हैं।
ज़्यादातर लोग
अपनों की ख़ुशियों,
घर की ज़रूरतों,
समाज की उम्मीदों
और भविष्य की चिंता के बीच
धीरे-धीरे
अपने सबसे प्रिय सपने को
एक तरफ़ रख देते हैं।
फिर भी...
सपने मरते नहीं।
वे चुपचाप
डायरी के किसी आख़िरी पन्ने में,
अलमारी में रखे किसी पुराने गिटार में,
सूख चुके रंगों की डिब्बियों में,
या किसी अधूरी कविता में
ज़िंदा रहते हैं।
और इंतज़ार करते हैं...
उस दिन का,
जब इंसान
सिर्फ़ अपनी रोज़ी नहीं,
बल्कि अपनी रूह भी कमाने लगे।
— अमित ममगाईं