बारिश की कुछ बूँदें
जब आ गिरती हैं
किसी रस्सी पर…
फिर धीरे-धीरे
उसी रस्सी पर सरकते हुए
एक-दूसरे से जा मिलती हैं।
कुछ दूर तक
साथ चलती हैं,
एक-दूसरे में घुलती हैं,
और फिर
एक साथ नीचे गिर जाती हैं।
सोचता हूँ कि
शायद ज़िंदगी भी
कुछ ऐसी ही है।
ज़िंदगी में कुछ लोग
हमारे साथ चलने लगते हैं
कुछ दूर तक…
हम उनके साथ
हँसी बाँटते हैं,
दर्द बाँटते हैं,
और धीरे-धीरे
उनमें अपना कुछ हिस्सा
छोड़ देते हैं।
हमें लगता है
ये साथ यूँ ही चलता रहेगा।
मगर ज़िंदगी की रस्सी पर
कोई साथ
आख़िरी सिरे तक नहीं चलता।
एक वक़्त आता है
जब रास्ता ख़त्म नहीं होता,
बस साथ छूट जाता है।
कोई पहले गिरता है,
कोई थोड़ा देर से…
और हम
उसी रस्सी पर ठहरे हुए
बस इतना सोचते रह जाते हैं...
अभी तो साथ थे…
शायद यही ज़िंदगी है!
मिलना,
कुछ दूर साथ चलना,
एक-दूसरे में घुल जाना…
और फिर
बिना किसी शिकवे के
अपने-अपने हिस्से की
ज़मीन पर गिर जाना।
क्योंकि
हर साथ का मक़सद
हमेशा साथ रहना नहीं होता।
कुछ लोग
बस इसलिए मिलते हैं
कि हमारी यात्रा में
कुछ दूर तक
हमारे साथ चल सकें।
और जब वे चले जाते हैं,
तो उनके साथ
चली हुई वह थोड़ी-सी दूरी
हमारे भीतर रह जाती है…
जिसे हम
उम्र भर
याद कहते हैं।
- अमित ममगाई