"रिश्ते कितने नाज़ुक..."
रिश्ते कितने नाज़ुक
कितने हल्के होते हैं
शब्दों से नहीं
बस भावों से बहते हैं
तभी तो आँखों में आए आँसू
इन रिश्तों में छलकते हैं
कभी खुशी बनकर मुस्काते हैं
कभी दर्द बनकर बरसते हैं
रिश्ते कोई बंधन नहीं
ये तो दिल की आवाज़ होते हैं
जहाँ शब्द भी मौन हो जाएँ
वहीं ये सबसे खास होते हैं
जरा संभालकर रखना इन्हें
ये काँच से भी नाज़ुक होते हैं
एक सच्चा अपनापन मिल जाए
तो उम्रभर के लिए खूबसूरत होते हैं
क्योंकि रिश्ते निभाए नहीं जाते
रिश्ते महसूस किए जाते हैं
और जहाँ भाव सच्चे हों
वहीं रिश्ते जिंदगी से भी
ज्यादा करीब होते हैं
-आचार्य अमित