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मुक़द्दर — (रूह की किताब के पन्ने)

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आओ, दिल की किताब के
        
                                                    
                            
चन्द पन्ने फिर पलटते हैं,
वक़्त की धूल में दबी
कुछ यादों को धीरे से
फिर से पढ़ते हैं।

उन धुंधलके-से लम्हों में
चलते हैं जहाँ कभी
ख़्वाबों ने आँखें खोली थीं,
जहाँ कुछ रिश्ते
दुआ बनकर मिले थे,
और कुछ जुदाइयाँ
सब्र का मतलब सिखा गई थीं।

आओ, माज़ी के दरीचों से
गुज़रते हुए
उन अधूरे क़िस्सों को भी
एक बार फिर सुनते हैं,
जिन्हें वक़्त ने ख़ामोशी दी,
मगर रूह ने
आज तक भुलाया नहीं।

कुछ रुस्वाइयों का ज़िक्र
फिर एक बार
फ़िक्र बनकर छेड़ते हैं,
कुछ टूटे हुए ख़्वाबों को
सीने से लगाकर
उनमें छुपे सबक़ पढ़ते हैं।

क्योंकि हर ज़ख़्म
सिर्फ़ दर्द नहीं होता,
कुछ ज़ख़्म
रूह के दरवाज़े खोलते हैं;
हर हार
सिर्फ़ शिकस्त नहीं होती,
कुछ हारें
इंसान को उसके असल से
मिलाती हैं।

सुना है—
पुराना वक़्त याद रखने से
मुक़द्दर संवरते हैं;
शायद इसलिए कि
जो कल की ठोकरों से सीखता है,
वही आज को सँवारता है
और कल की राह
रौशन करता है।

तो आओ,
बीते हुए कल से
गिला नहीं—गुफ़्तगू करते हैं,
अपने हर आँसू को
एक दुआ में ढालते हैं,
हर टूटन को
एक नई शुरुआत मानते हैं।

और फिर
दिल की किताब बंद करने से पहले
एक नया पन्ना खोलते हैं—
जहाँ डर नहीं,
उम्मीद लिखी हो;
जहाँ शिकवा नहीं,
शुक्र लिखा हो;
जहाँ अतीत की राख से
मुस्तक़बिल के ख़्वाब
फिर जन्म लेते हों।

क्योंकि मुक़द्दर
सिर्फ़ सितारों में नहीं लिखा होता—
कुछ लकीरें
हम अपने हौसलों से बनाते हैं,
कुछ रास्ते
अपने क़दमों से चुनते हैं,
और कुछ मंज़िलें
रब पर भरोसा रखकर
चलते-चलते पा जाते हैं।

शायद यही ज़िंदगी है—
माज़ी से सबक़,
आज से इबादत,
और मुस्तक़बिल से उम्मीद।
-आचार्य अमित
2 महीने पहले
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