कुछ तुम, कुछ हम...
कुछ तुम, कुछ हम,
मिलकर भी न मिल सके।
पास होकर भी जाने क्यों,
दिल से दिल न खिल सके।
कुछ तुम, कुछ हम,
खामोशियों में यूँ ही ढलते रहे,
लब मुस्कुराते रहे मगर,
जज़्बात भीतर ही पलते रहे।
न तुम बेपरवाह थे,
न हम बेख़बर थे।
बस इश्क़ इतना गहरा था,
कि अल्फ़ाज़ उसके हमसफ़र न बन सके।
इस दिल में
बेपनाह मोहब्बत का समंदर था,
मगर उसकी लहरों का शोर
दुनिया कभी सुन न सकी।
जो दिखा लोगों को,
वो बस फ़ासलों का धुआँ था;
जो छिपा रहा उम्रभर,
वही रूह का सच्चा कारवाँ था।
शायद कुछ रिश्ते
मुकम्मल होने के लिए नहीं,
महसूस होने के लिए जन्म लेते हैं।
वो हमें बिछड़कर भी
मोहब्बत का अर्थ सिखा जाते हैं।
आख़िर में जब
ज़िंदगी अपने सारे सवाल समेट लेगी,
तब भी एक ही उत्तर
धड़कनों में गूँजेगा—
कुछ तुम...
कुछ हम...
— आचार्य अमित