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काश... "मैं" से "हम" तक

Amit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत-से भेद सहेज रखे हैं
        
                                                    
                            
इस मौन हृदय ने।
काश! तुमने भी इन
आँखों की भाषा पढ़ी होती।

काश! तुमने भी
समय की धार पर
कुछ पल घिसे होते,
तो शायद समझ पाते
कि रिश्ते शब्दों से नहीं,
संवेदनाओं से साँस लेते हैं।

काश! तुमने भी
भूख का स्वाद चखा होता—
सिर्फ रोटी की नहीं,
अपनापन, सम्मान
और स्नेह की भूख का।

काश! तुमने भी
रोष की अग्नि में
कुछ देर तपे होते,
तो जान पाते कि
क्रोध के पीछे भी
अक्सर टूटे हुए मन की
पुकार छिपी होती है।

काश! तुम्हारा "तुम"
मेरे "हम" में ढल गया होता,
और इस "हम" ने
सिर्फ साथ नहीं,
एक साझा संसार रचा होता।

पर आज...
बिना एक-दूसरे के,
यह "हम"
फिर से "मैं" और "तुम" में
बँटता चला जा रहा है।

फिर भी विश्वास है—
जहाँ संवेदनाएँ जीवित रहती हैं,
वहाँ बिखरे हुए रिश्ते भी
एक दिन फिर जुड़ जाते हैं।

क्योंकि अंततः
जीत किसी "मैं" या "तुम" की नहीं होती,
जीत तो हमेशा "हम" की होती है।
-आचार्य अमित
3 महीने पहले
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