"हुस्न की बेड़ियाँ..."
रोक लेता है इश्क़
मेरे कदमों को,
अपने एहसास की
बेड़ियाँ पहनाकर।
और मैं...
हर बार मुस्कुराते हुए
बंधता चला जाता हूँ,
उस हुस्न की कैद में
जो मेरे लिए आज़ादी से भी
ज़्यादा अज़ीज़ है।
ज़माना जिसे
ज़हालत कहकर ठुकरा देता है,
वही तो मेरी रूह की
सबसे बड़ी इबादत है।
क्योंकि सच्चा इश्क़
कभी कैद नहीं करता,
वह तो इंसान को
उसकी अपनी गहराइयों से मिलवाता है।
जो इन बेड़ियों को समझ पाए,
वही मोहब्बत का असली मुसाफ़िर है;
और जो न समझ सके,
उसके लिए यह बस
ज़माने की ज़हालत ही रहेगी।
— आचार्य अमित