हम जो भी थे, वो भी न हुए
इस वक़्त की आँधी में
कुछ आबाद हुए
कुछ बर्बाद हुए
कुछ ख़्वाब थे जो आँखों में पलते रहे
कुछ ख़्वाब थे जो आँखों के सामने ही राख हुए
कुछ मह्र ओ नक़्श थे
कुछ हुनर थे
वक़्त की धूप में तपते रहे
और तपकर ही
कुछ और दिलशाद हुए
कुछ काँटों की फ़ितरत थी
सो चुभे भी
कुछ ज़ख़्म दे गए
कुछ दर्द दे गए
और कुछ ऐसे मिले
जो ज़ख़्म देकर भी
जीने का हुनर सिखा गए
फिर भी फूलों ने
कभी काँटों से शिकायत नहीं की
मुरझाए तो क्या हुआ
अगली सुबह
ख़ुशबू बनकर लौट आए
शायद ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही है
जो हमसे छीनती है
वही हमें भीतर से गढ़ती भी है
जो हमें तोड़ती है
वही कहीं न कहीं
हमें नया आकार देती है
आज नहीं तो कल समझोगे
ये दुनियादारी
ये कारगुज़ारी
जिन रास्तों से तुम भागते हो
अक्सर उन्हीं रास्तों पर चलकर
इंसान पहली बार
अपने आप से मिलता है
हम भी बचते रहे
ज़िंदगी से
लोगों से
कुछ रिश्तों से
और शायद सबसे ज़्यादा
ख़ुद से
इस बचने की कोशिश में
कितनी शामें ख़ामोश हुईं
कितनी रातें बेआवाज़ हुईं
कितने ख़्वाब
आँखों में ही दफ़्न हुए
और कितने अरमान
दिल के दरवाज़े पर
आकर वापस लौट गए
हमने जिस बुत को
शिद्दत की माला जप जपकर पूजा था
ज़रा उससे भी पूछो
उसकी चौखट पर झुकने वालों के
कितने घर आबाद हुए
और कितने दिल
सजदे में ही बर्बाद हुए
मगर शिकवा भी क्या करना
जो होना था सो हो गया
जो छूटना था छूट गया
जो जाना था चला गया
फिर काहे का रोना है
झरने की क़िस्मत में
पहाड़ों से गिरना ही तो लिखा है
मगर गिरना उसकी हार कहाँ है
वही गिरता हुआ पानी
पत्थरों से टकराकर
साज़ बन जाता है
वही बिखरती हुई बूँद
किसी प्यासे की
प्यास बुझाती है
कभी कभी
टूटना भी ज़रूरी होता है
बिखरकर यह जानने के लिए
कि हमारे भीतर
हमसे भी बड़ा कोई अस्तित्व है
हर गिरावट में
एक नई उड़ान छिपी होती है
हर आँसू में
एक अनकही दास्तान होती है
हर ख़ामोशी के भीतर
एक जन्म लेता हुआ गीत होता है
और शायद इसी लिए
मैं अपने ज़ख़्मों से नाराज़ नहीं हूँ
उन्होंने मुझे रुलाया
मगर मुझे गहरा भी किया
उन्होंने मुझसे लोग छीने
मगर मुझे मेरा आप भी दिया
उन्होंने मुझे अकेला किया
मगर उसी तन्हाई में
मैंने अपने भीतर की आवाज़ सुनी
और इस सोने की हसरत में ऐ दोस्त
जाने कितने दिल
यूँ ही दिल ए बर्बाद हुए
मगर याद रखना
हर टूटना अंत नहीं होता
हर बिछड़ना विराम नहीं होता
कुछ रिश्ते छूटकर भी
हमें पूरा कर जाते हैं
कुछ लोग दूर होकर भी
हमारे भीतर रह जाते हैं
कुछ दर्द
कभी भरते नहीं
बस हमारे साथ जीना सीख जाते हैं
और कुछ आँसू
गालों तक पहुँचने से पहले ही
दुआ बन जाते हैं
तुम मेरे हो
मैं हूँ किसका
तुमने तो मुझे
अपना कहा नहीं
और किसी और का हो जाना
हमें कभी आया ही नहीं
हमने मोहब्बत को
मोहब्बत की तरह जिया
हिसाब की तरह नहीं
न पाने की शर्त रखी
न लौटने की उम्मीद
बस दिल दिया
और दिल से दिया
इस खोने पाने की उलझन में
बहुत कुछ खोया
बहुत कुछ पाया
कभी ख़ुद को
कभी अपना साया
कभी किसी की याद
तो कभी अपनी ही परछाईं से
एक नया रिश्ता बनाया
और आख़िर में
जब बहुत दूर निकलकर
पीछे मुड़कर देखा
तो ज़िंदगी ने मुस्कुराकर
बस इतना कहा
जिसे तुम अंत समझ रहे थे
वहीं से तो शुरुआत थी
तुम्हारे टूटने में भी
तुम्हारा बनना छिपा था
तुम्हारे बिछड़ने में भी
तुम्हारा मिलना छिपा था
तुम्हारी ख़ामोशी में भी
एक पूरी ग़ज़ल पल रही थी
इसलिए
अगर आज दिल भारी है
तो उसे भारी रहने दो
हर दर्द को
तुरंत शब्द देना ज़रूरी नहीं
कुछ दर्दों को
समय की गोद में सोने दो
कल जब सुबह होगी
तो शायद वही आँखें
जो आज आँसुओं से भरी हैं
किसी नई रोशनी को
पहचान लेंगी
शायद वही हाथ
जो आज किसी का हाथ ढूँढ़ रहे हैं
कल किसी गिरे हुए को
उठाने के लिए बढ़ेंगे
शायद वही दिल
जो आज बिखरा पड़ा है
कल किसी और के अँधेरे में
दीया बनकर जलेगा
क्योंकि
जो टूटकर भी बच जाता है
वही असली मज़बूती है
जो रोकर भी मुस्कुरा देता है
वही असली ज़िंदगी है
और जो खोकर भी
मोहब्बत पर यक़ीन रखता है
वही सच में
इंसान है
तो आज अगर
कुछ भी अपना नहीं लगता
तो घबराना मत
वक़्त की नदी
किसी एक किनारे पर
ठहरती नहीं
आज तुम लहरों में हो
कल किनारा भी तुम्हारा होगा
आज रास्ता धुँधला है
कल मंज़िल का चेहरा भी साफ़ होगा
बस चलते रहना
धीरे सही
थके हुए सही
टूटे हुए सही
मगर चलते रहना
क्योंकि कभी कभी
ज़िंदगी हमें वहाँ नहीं ले जाती
जहाँ हम जाना चाहते हैं
वह हमें वहाँ ले जाती है
जहाँ हमें होना होता है
और फिर एक दिन
जब तुम अपने पुराने ज़ख़्मों को
छूकर मुस्कुराओगे
तो समझोगे
कुछ दर्द
सज़ा नहीं थे
सीढ़ियाँ थे
कुछ बिछड़ना
हार नहीं था
रास्ता था
कुछ टूटना
अंत नहीं था
एक नई शुरुआत थी
और तब शायद
दिल बहुत धीमे से कहेगा
हम जो भी थे
वो भी न हुए
मगर जो बन गए
वो पहले कभी थे ही नहीं
और जो टूटकर भी बचे हैं
वही कल
किसी नई सुबह की वजह होंगे
क्योंकि रात चाहे कितनी भी गहरी हो
सुबह को आने से
कभी रोक नहीं सकती
-आचार्य अमित