दहलीज़
दस्तूर दुनिया का नहीं, तुम्हारे अहम का है,
जिसने ख़ुद से गर किनारा ज़रा कर लिया होता...
मिट जाती सियाह परतें अना की तमाम,
और भीतर का दिया ख़ुद-ब-ख़ुद जल गया होता।
आपका भी मुक़ाम यूँ ज़ाया न हुआ होता,
अगर ज़रा-सा ख़ुद को आपने खोया होता।
ग़ुरूर के साए से निकलकर, ऐ मुसाफ़िर,
कभी रूह के आईने में ख़ुद को तका होता!
आप भी रहते फिर किसी गुलफ़्शाँ के दिल में,
जहाँ दर्द भी मोहब्बत की धूप में पिघलता है।
जहाँ बूँद भी गिरकर समंदर-सी हो जाती है,
और हर ज़ख़्म मन्नत-सा सँभलता है।
आपका भी दीदार जी-भर फिर हमने किया होता,
नैनों की तिश्नगी को सुकून मिल गया होता।
तड़पते न यूँ हिज्र की सर्द रातों में हम,
गर फ़ासलों का ये पर्दा हटा दिया होता।
महरो-ख़ुदा बख़्शे हैं किसी की इनायत ने,
ये जो नूर मिला है, उसी की रहमत का साया है।
सब कुछ तो अता किया है उस मालिक ने हमको,
बस हमने ही, ख़ुदाया... उसका ऐतबार न किया होता!
-आचार्य अमित