चिंगारी
सब बदल गया...
बस, उसके इतना कहने से—
"कैसे हो? कहाँ हो? दिखते नहीं!"
वर्षों से जो दफ़्न थीं सीने में,
वो बुझी हुई चिंगारियाँ फिर सुलग उठीं।
याद आ गई...
कुछ कंपकंपाते होंठों की वो बानगी,
कुछ सुराहीदार गर्दन का हसीं तसव्वुर,
कुछ उन झील सी गहरी आँखों के शिकवे,
और बहुत कुछ... वो ज़ुल्फ़ें बिखरी हुई सी!
दिल का मौसम यूँ अचानक बदला,
मानो सावन के काले बादलों से,
कोई बेताब बिजली...
सीधे इस सूने आसमान से आ गिरी हो!
-आचार्य अमित