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उर्दू शायरी

Amit Goswami

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यहीं कभी फिर मिलेंगे हम, इस यक़ीं पे दानों बिछड़ रहे हैं
        
                                                    
                            
जहाँ पे पहले पहल मिले थे, वहीं पे दोनों बिछड़ रहे हैं

वो मौसम−ए−वस्ल था कि ख़्वाबों के आसमाँ पर मिले थे दोनों
ये हिज्र की रुत, हक़ीक़तों की ज़मीं पे दोनों बिछड़ रहे हैं

हज़ार क़िस्से हैं आशिक़ों के, हर इक का अंजाम बस वही है
कहीं गले मिल के रो रहे हैं, कहीं पे दोनों बिछड़ रहे हैं

इस तर्क-ए-मुलाक़ात का मातम नहीं करना
घर लौट के अब आँखों को फिर नम नहीं करना

मैं भी तुम्हें पाने की कोई ज़िद न करूँगा
तुम भी मुझे खोने का कोई ग़म नहीं करना

ख़्वाब में दोनों थे, ता'बीर में तुम थीं ही नहीं
गरचे हम साथ थे, तस्वीर में तुम थीं ही नहीं

ज़ेहन में, याद में, हर साँस में मौजूद थीं तुम
पर मैं क्या करता कि तक़दीर में तुम थीं ही नहीं

सवाल जितने थे, सबके जवाब दे आया
मैं उसके हाथ में अपनी किताब दे आया

वो जिसके बस में थीं ख़्वाबों की सारी ताबीरें
मैं उसकी आँखोँ को सब अपने ख़्वाब दे आया

कभी जो तोड़ा था, उस भरोसे का रंज हो, तो पुकार लेना
अधूरी क़समों का झूटे वादे का रंज हो, तो पुकार लेना

पुरानी उल्फ़त में गर किसी दिन नई मुहब्बत का दुख करो, या
नई रफ़ाक़त में पिछले रिश्ते का रंज हो, तो पुकार लेना

ये कारोबार-ए-वफ़ा है, इसमें हिसाब-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ अलग है
किसी को पाकर भी मुझको खोने का रंज हो, तो पुकार लेना

तुम्हारे जाने के बाद पीछे से जाने कितनी सदाएँ दीं हैं 
मेरी सदा पर पलट न आने का रंज हो तो पुकार लेना

पुकार लेना ज़ेहन में गर कुछ सवाल बाक़ी बचे हुए हों  
लबों पे ठहरे गिले का, शिकवे का रंज हो, तो पुकार लेना
-अमित गोस्वामी
11 घंटे पहले
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