उनका क्या उपचार करूँ, जो बिन बात बिछड़ जाते हैं,
साँझ-सवेरे याद बनें, और मन में गड़ जाते हैं।
जिनके साथ नैनों ने सपनों की बेलें बोई थीं,
उनके संग ही हर चाहत की बातें हम ने खोई थीं।
अब वो धूप पराए मन की, छाँव नहीं बन पाते हैं,
चुपचाप गुजरते पथ पर, आँसू बन बरस जाते हैं।
बिछुड़न की यह पीर कहीं, कोई मरहम नहीं बनाती,
हर याद वही ज़ख्म बने, जो अब तक भी दहलाती।
तुम कह दो कुछ दवा अगर हो, इस दिल के बेचैन लिए,
किंतु प्रेम का रोग सुने हैं, जाता नहीं हकीम पिए।
उनका क्या उपचार करूँ, जो चाह के भी पास नहीं,
वो छाया से दूर हुए हैं, पर अब भी महसूस यहीं।
-अमन केशरी सिंह