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अधूरी प्रीति

Aman singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नयन मिले चुपचाप थे, मन से मन संवाद।
        
                                                    
                            
बिन बोले ही सब कहा, बन न सका प्रबाध।।

छांव मिली कुछ क्षण सजी, फिर आई फिर धूप।
ख्वाब खिले पर साथ में, बरसी अश्रु की रूप।।

पत्र अधूरे छूटते, उत्तर राह गुमाय।
चाहत तक ही सीमित थे, प्रेम न ठहराय।।

नाम नहीं, न रूप था, फिर भी था अपनाव।
मौन बसा था नेह सा, पलकों में अभाव।।

प्रीति रही पर पूर्ण न, ना था कोई गीत।
हर मोड़ उसकी छाया, पर न मिला समीप।।
एक वर्ष पहले
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